जानें- क्यों मनाते हैं राखी का त्यौहार? रक्षाबंधन से जुड़ीं अमर कहानियां

लखनऊ. रक्षाबंधन का त्यौहार देश भर में धूमधाम मनाया जाता है। इस दिन बहनें की भाई की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र की दुआ करती है और बदले में भाई जिंदगी भर बहनों की रक्षा करने का का वादा करता है। पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से इस त्यौहार का अपना अलग ही महत्व है। चाहे वह रानी कर्णवती का हुमायुं को राखी भिजवाना हो या फिर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा चीरहरण के वक्त द्रौपदी की रक्षा करना हो।

पति-पत्नी ने शुरू किया था रक्षाबंधन का त्यौहार
वैसे तो रक्षा बंधन का त्यौहार भाई-बहन मनाते हैं, पर क्या आप जानते हैं कि यह त्यौहार भाई-बहन ने नहीं बल्कि पति-पत्नी ने शुरू किया था। उन दोनों के बाद ही दुनिया भर में रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाने लगा।

 

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पुराणों के अनुसार एक बार दानवों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया था। देवता दानवों से हारने लगे। देवराज इंद्र की पत्नी शची देवताओं की हो रही हार से घबरा गईं और इंद्र के प्राणों की रक्षा के तप करना शुरू कर दिया, तप से उन्हें एक रक्षासूत्र प्राप्त हुआ। शची ने इस रक्षासूत्र को श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई पर बांध दिया, जिससे देवताओं की शक्ति बढ़ गयी और दानवों पर जीत प्राप्त की।

किसे बांधनी चाहिए राखी
श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षासूत्र बांधने से इस दिन रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाने लगा। पुराणों के अनुसार आप जिसकी भी रक्षा एवं उन्नति की इच्छा रखते हैं उसे रक्षा सूत्र यानी राखी बांध सकते हैं, चाहें वह किसी भी रिश्ते में हो।

 

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राखी बांधते समय मंत्र जपना जरूरी
रक्षाबंधन का त्यौहार बिना राखी के पूरा नहीं होता, लेकिन राखी तभी प्रभावशाली बनती है जब उसे मंत्रों के साथ रक्षासूत्र बांधा जाए। मंत्र है- ‘येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः। ते नत्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे! मा चल! मा चल!!’

इस मंत्र का अर्थ है कि जिस प्रकार राजा बलि ने रक्षासूत्र से बंधकर विचलित हुए बिना अपना सब कुछ दान कर दिया। उसी प्रकार हे रक्षा! आज मैं तुम्हें बांधता हूं, तू भी अपने उद्देश्य से विचलित न हो और दृढ़ बना रहे।

 

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मंत्र से जुड़ी कथा वामन पुराण की एक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने जब राजा बलि से तीन पग में उनका सब कुछ ले लिया था, तब राजा बलि ने भगवान विष्णु से एक वरदान मांगा। वरदान में बलि ने विष्णु भगवान को पाताल में उनके साथ निवास करने का आग्रह किया। भगवान विष्णु को वरदान के कारण पाताल में जाना पड़ा। इससे देवी लक्ष्मी को बहुत दुखी हुईं। लक्ष्मी जी भगवान विष्णु को बलि से मुक्त करवाने के लिए एक दिन वृद्ध महिला का वेष बनाकर पाताल पहुंची और उन्हें राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया। बलि ने जब लक्ष्मी से कुछ मांगने के लिए कहा तो लक्ष्मी ने उनसे भगवान विष्णु को पाताल से बैकुंठ भेजने के लिए कहा।
बहन की बात रखने के लिए राजा बलि ने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी के साथ बैकुंठ भेज दिया। भगवान विष्णु ने बलि को वरदान दिया कि चतुर्मास की अवधि में वह पाताल में आकर रहेंगे। इसके बाद से हर साल चार महीने भगवान विष्णु पाताल में रहते हैं।

 

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भगवान श्रीकृष्ण ने बचाई द्रौपदी की लाज
महाभारत काल में जब युधिष्ठर दुर्योधन के हाथों अपनी पत्नी द्रौपदी को जुएं में हार गए तो वह द्रौपदी का चीर हरण करना चाहता। द्रौपदी ने पांचों पतियों और सभा में मौजूद लोगों से मदद की गुहार लगाई, तब किसी ने द्रौपदी की मदद नहीं की। द्रौपदी ने भइया कहकर श्रीकृष्ण को याद किया तो भगवान उन्हें बचाने दौड़े चलाए। बताया जाता है कि इससे पहले द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को राखी बांधी थी।

हुमायुं और रानी कर्णवती

 

हुमायुं-कर्मवती का किस्सा
यह ऐतिहासिक कहानी उस समय की है, जब राजा-महाराजा जरा सी भी बात पर युद्ध करने को उतारू हो जाते थे। उन दिनों चित्तौड़ पर बहादुर शाह नामक राजा ने आक्रमण कर दिया। चित्तौड़ की रानी कर्णवती विधवा थीं। उनके पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वो बहादुर शाह जफर से अपने राज्य की रक्षा कर सकें। तब हिंदू रानी कर्मवती ने मुस्लिम शासक हुमायुं को राखी भेजकर मदद की प्रार्थना की। राखी पाकर हुमायुं बहन कर्णवती की रक्षा करने के लिए सेना के साथ उसी समय चित्तौड़ के लिए निकल पड़ा, लेकिन तब तक बहादुर शाह चित्तौड़ को कब्जे में ले चुका था और रानी कर्णवती चित्तौड़ की वीरांगनाओं के साथ जौहर कर चुकी थीं। कर्णवती मौत की खबर ने हुमायुं को अंदर तक हिला कर रख दिया। उसने बहादुर शाह को हराकर चित्तौड़ का राज्य रानी कर्णवती के बेटे विक्रमजीत को सौंप दी।

 

Rakhi

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