हरतालिका तीज व्रत-कथा, पूजा व विधि और महात्म

लखनऊ. हरतालिका तीज व्रत सामान्य व्रतों से कठिन और विशेष फल देने वाला माना जाता है। हरतालिका तीज को गौरी तृतीया भी कहा जाता है। इस व्रत को महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना के साथ रखती हैं। कुंआरी युवतियां भी सुयोग्य और सुंदर वर की इच्छा में हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं। हरतालिका तीज व्रत को विधवा महिलाएं भी रख सकती हैं। इस व्रत में भगवान शिव, माता गौरी (पार्वती) और प्रथम पूज्य गणेश का पूजन किया जाता है। हरतालिका तीज व्रत भाद्रपद (अगस्त), शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस साल अगस्त महीने की 24 तारीख को Hartalika Teej 2017 का व्रत रखा जाएगा। यह व्रत निर्जला (बिना पानी पिये) और निराहार (बिना कुछ खाये) रहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से मां पार्वती प्रसन्न होकर व्रत करने वाली महिलाओं के पति को लंबी उम्र आशीर्वाद देती हैं और भगवान भोलेनाथ खुद उनके सुहाग की रक्षा करते हैं।

हरतालिका तीज व्रत व पूजन व पूजन
गौरी तृतीया के व्रत को रखने वाली महिलाएं नए लाल वस्त्र पहनती हैं। मेंहदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार कर शुभ मुहूर्त में भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश का पूजन करती हैं। मूर्तियों पर फूल, पुष्प, नैवेद्य चढ़ाकर हरतालिका तीज व्रत की कथा सुनती हैं और फिर भगवान की आरती करती हैं। महिलाएं भगवान शिव को जहां बिल्व पत्र, धतूरा, दूध, भांग, मिठाई और फूल आदि चढ़ाती हैं, वहीं माता पार्वती पर सुहागिनों के श्रृंगार का सारा सामान चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि हरतालिका तीज व्रत का पूजन करने वाली महिलाओं के सुहाग की माता पार्वती और भगवान शिव रक्षा करते हैं। इतना ही नहीं भगवान शिव विधि-विधान से पूजन करने वाली व्रतियों के सभी कष्टों को हर लेते हैं।

 

Hartalika Vrat Katha

 

रात भर होता है शिव-पार्वती का भजन-कीर्तन
हरतालिका तीज व्रत रखने वाली महिलाएं व युवतियां सुबह से तैयारियों में जुट जाती हैं। महिलाएं इस व्रत में तीन बार भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश की विधिवत पूजा करती हैं। वर्षों से हरतालिका का व्रत रखती आ रहीं निर्मला द्विवेदी (59) बताती हैं कि वह हर साल विधि-विधान से हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं। इस व्रत में वह वैसे तो व्रत के आरंभ होने की सुबह से अगली सुबह तक कई बार पूजा करती हैं, लेकिन तीन बार विधिवत पूजन करती हैं। वह बताती हैं कि व्रत वाले दिन सुबह स्नान के बाद वह गणेश जी के साथ भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करती हैं। फिर सूर्यास्त के बाद विधि-विधान से हरतालिका तीज व्रत कथा और पूजन करती हैं। फिर रात में 12 बजे विधिवत पूजन किया जाता है। इसके बाद सुबह 4 बजे पूरा श्रंगार करके भगवान शिव, माता पार्वती और गजानन गणेश का व्रत-पूजन करती हैं और भगवान से अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। हरतालिका तीज व्रत में महिलाएं रतजगा कर नाच-गाना करती हैं और भगवान शिव के भजन गाती हैं। यह व्रत पूरी तरह निर्जला व निराहार रहा जाता है।

पूजन सामग्री
गीली काली मिट्टी या रेत, बिल्व पत्र, शमी पत्र, केले का पत्ता, धतूरे का फल एवं पत्ता, भांग, अकांव का फूल, तुलसी, आम का पत्ता, आम की लकड़ी, मंजरी, जनेऊ की जोड़ी, नाड़ा, वस्त्र, सभी प्रकार के फल व पत्ते, श्रीफल, सुपाड़ी, कलश, अबीर, चंदन, घी, तेल, कपूर, कुमकुम, दीपक, अगरबत्ती, घी, शक्कर, दही, दूध, पंचामृत आदि। इसके अलावा माता पार्वती पर चढ़ाने के लिए सुहागिनों की श्रृंगार सामग्री।

 

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महिलाएं क्यों रखती हैं हरतालिका व्रत ?
शिव पुराण के मुताबिक, हरतालिका तीज के व्रत को सबसे पहले राजा हिमांचल की पुत्री माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए रखा था। मां गौरी के व्रत से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। तब से आज तक महिलाएं इस व्रत को पतियों की लंबी उम्र की कामना के साथ रखती हैं, वहीं युवतियां शिव जैसे सुंदर वर की इच्छा में इस व्रत को रखती हैं। आमतौर पर महिलाएं इस व्रत का पूजन मंदिरों में करती हैं, लेकिन जहां मंदिर घर से दूर हो महिलाएं घर में विधिवत भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी का पूजन करती हैं।

क्या है हरतालिका तीज व्रत कथा ?
पार्वती जब भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए उनकी कठोर तपस्या कर रही थीं। उस वक्त सहेलियों ने ही पार्वती को अगवा कर लिया था। इस कारण इस व्रत को हरतालिका का कहा जाता है। क्योंकि देवभाषा संस्कृत में ‘हरत’ का मतलब होता है अगवा करना और ‘आलिका’ का मतलब सहेली। तभी से व्रत को हरतालिका व्रत कहा जाता है।

 

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हरतालिका तीज के नियम
हरतालिका तीज व्रत को एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता है। अर्थात जिस घर में हरतालिका की पूजा एक बार हो जाती है, उस घर में पूजा का खंडन नहीं किया जा सकता है और एक परंपरा की तरह हर साल इस व्रत को किया जाता है। हरतालिका व्रत प्रदोष काल में किया जाता है। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। इस व्रत में काली मिट्टी व रेत से शिव, पार्वती और गणेश की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। जिन्हें एक थाल में चौकी बनाकर केले के पत्ते पर विराजमान कराया जाता है। सर्वप्रथम कलश का पूजन किया जाता है। फिर गणेश जी और फिर भगवान शिव और इसके बाद माता पार्वती का पूजन किया जाता है। इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती है। आरती के बाद भगवान का पूजन होता है। सुबह आखिरी पूजा के बाद माता गौरी को सिंदूर चढ़ाया जाता है, उसी सिंदूर से व्रत रखने वाली सुहागिन महिलाएं सुहाग लेती हैं।

ककड़ी खाकर होता है व्रत का परायण
महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश का हलवा और ककड़ी और पंचामृत का भोग लगाती हैं। इसके बाद उसकी ककड़ी को खाकर महिलाएं अपना उपवास तोड़ती हैं। आखिर में पूजन की सभी सामग्री को एकत्रित कर पवित्र नदी व कुंड में विसर्जित कर दिया जाता है।

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