कांग्रेस-भाजपा बार बार तो तीसरा मोर्चा अबकी बार

24TH_MULAYAM_732283fऐसा नहीं कि तीसरे मोर्चे की कल्पना निरर्थक और निराधार है। देश की सांस्कृतिक बहुलता और सुगठित संघीय व्यवस्था की रचना के लिए इसकी ज़रूरत है। लेकिन इसके लिए एक मजबूत नेतृत्व चाहिए। मजबूर नेतृत्व नहीं। मुलायम सिंह की ‘देश बनाओदेश बचाओ रैलीन केवल यूपी में वोटरों को संदेश देने के लिए है बल्कि यूपी से अधिक यूपी से बाहर के सियासी दलों को यह समझाना है कि कांग्रेस-भाजपा बार बार तो तीसरा मोर्चा अबकी बार। वैसे तो मुलायम सिंह बड़े-बड़े नेताओं से संबंध बनाने,मनाने में माहिर रहे हैं। लेकिन बड़े नेता मुलायम को तीसरे मोर्चे के अगुवा की कमान सौंपने से हमेशा चौकन्ने रहे हैं, यही वजह है कि बीते 2009 के लोकसभा चुनाव में भी मुलायम का सुर अकेला पड़ गया था और मुलायम कांग्रेस को सत्ता में मजबूती से आने से रोक नहीं पाए। इस बार के आम चुनाव में राष्ट्रीय परिदृश्य पर कांग्रेस और भाजपा दोनों को लेकर मतदाता उत्साहित नहीं हैंपर कोई वैकल्पिक राजनीति भी नहीं है। उम्मीद की किरण उस अराजकता और अनिश्चय पर टिकी है जो चुनाव के बाद पैदा होगी। ऐसा नहीं कि तीसरे मोर्चे की कल्पना निरर्थक और निराधार है। देश की सांस्कृतिक बहुलता और सुगठित संघीय व्यवस्था की रचना के लिए इसकी ज़रूरत है। लेकिन इसके लिए एक मजबूत नेतृत्व चाहिए। मजबूर नेतृत्व नहीं। मुलायम सिंह ने अभी तक अपने राजनीतिक कैरियर में कई फैसले तो लिए हैं लेकिन कभी भी कोई भी ऐसा फैसला नहीं रहा है जो ये साबित कर पाए कि मुलायम कांग्रेस और बीजेपी को दो टूक जवाब देने की हैशियत में हैं। यूपी में समाजवादी पार्टी का यह स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। मुलायम सिंह के यूपी का मुख्यमंत्री न बनने की एक वजह ये भी रही है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके लिए तीसरे मोर्चे के लिए संगठन तैयार करना संभव नहीं था । लेकिन हकीकत है कि इन दो सालों में मुलायम सिंह तीसरे मोर्चे की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ा पाए। राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर मुलायम सिंह और रामगोपाल की रणनीति ने ममता बनर्जी को ऐसा संकेत दिया कि कोई भी सियासी दल मुलायम सिंह की बातों पर जल्दी भरोसा नहीं करेगा।

हालांकि मुलायम सिंह भी अब मानते हैं कि उनकी मुहिम लोकसभा चुनाव के बाद ही रंग लाएगी । क्योंकि अभी मोर्चा बनने से टिकट बंटवारे को लेकर मतभेद पैदा हो सकते हैं। लेकिन यहीं से एक और सवाल उठ खड़ा होता है। क्या तीसरे मोर्चे के सियासी दल बीजेपी और कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि खुद की गोटी सेट करने में लगे हैं। क्योंकि अगर बीजेपी और कांग्रेस से अगल तीसरा मोर्चा बनाना है और सत्ता में आना है कुछ सीटों पर समझौता कर सीटें जीतने में बुराई ही क्या है।

वैसे देश में थर्ड फ्रंट की अगुआई हमेशा वामपंथी दलों ने की है। उन्होंने बीजेपी की हिंदुत्ववादी राजनीति की काट के रूप में एक सेक्युलर गठबंधन की अवधारणा को आगे बढ़ाया। आर्थिक और दूसरे पहलुओं को लेकर भी इसका एक अलग कार्यक्रम रहा है। लेकिन धीरे-धीरे यह महज एक रणनीतिक गठबंधन बनकर रह गया। इसके पिछले संस्करणों को देखें तो तीसरे मोर्चे की अवधारणा विशुद्ध स्वार्थ का गठजोड़ साबित हुआ है।

मुलायम सिंह ने 30 अक्टूबर को दिल्ली में 17 सियासी दलों की रैली में कहा है कि अगर हम एक होते हैं तो साम्प्रदायिक शक्तियां सिर नहीं उठा सकेंगी। हमने साम्प्रदायिक शक्तियों को कुचला है और साम्प्रदायिक शक्तियां जब-जब अपना सिर उठाएंगीहम उन्हें कुचलेंगे।’ नीतीश और मुलायम सिंह के अलावा इस सम्मेलन में माकपा नेता प्रकाश कारत और सीताराम येचुरी,राकांपा के डीपी त्रिपाठीजद (एस) के एचडी देवेगौड़ाअन्नाद्रमुक के एम थंबीदुरै और भाकपा के एबी बर्धन शामिल थे। ये वो चेहरे हैं जो तीसरे मोर्चे में अवसर को देखते हुए शामिल हो सकते हैं या तीसरा मोर्चा बना सकते हैं। तीसरे मोर्चे को लेकर जनता के मन में एक बड़ा संदेह भी है कि हमारे देश में केन्द्रीय नेतृत्व में तीसरा मोर्चा कभी सफल नहीं रहा। ऐसा भी है कि कांग्रेस और भाजपा अपनी ऊर्जा को इसमें भी खपाती रहीं हैं कि कोई भी राजनीतिक दल तीसरे मोर्चे का सपना भी कोई न देखे और इस मकशद में कामयाब भी हुईं हैं। इस बार तीसरे मोर्चे को लेकर जो सबसे सकारात्मक है वह यह है कि कांग्रेस की अगुआई वाला सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन विखंडित होता नजर आ रहा हैतो नरेंद्र मोदी को कमान सौंपने के बावजूद भाजपा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का विस्तार नहीं कर पाई है। ऐसे में अगर चुनाव बाद भी तीसरे मोर्चे की कवायद में जुटी राजनीतिक पार्टियां कुछ अधिक सीटें पातीं हैं तो सत्ता की तस्वीर बदल सकती है। लेकिन पीएम मुलायम सिंह बनेंगे या नितिश या फिर जयललिता इसे तो वामपंथी दल ही तय करेंगे इसके बाद भी पीएम बनने की रेस में मुलायम आगे हैं इसे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि केन्द्रीय सत्ता की कमान चंद्रशेखर सिंह, देवगौड़ा और गुजराल को मिलेगी इसे भी किसी ने सोचा नहीं था।   

 

अखिलेश कृष्ण मोहन

(ब्यूरो-डीडीसी न्यूज़, लखनऊ)

 

 

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